सुप्रीम कोर्ट: बंधुआ मजदूरों को सात दिन में मिले सहायता
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह ने 2 नवंबर को फैसला दिया कि सहायता मुक्ति प्रमाणपत्र के सात दिनों के भीतर मिले, और लंबित फौजदारी मामला इसे नहीं रोक सकता।
मुख्य बिंदु
- भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 2 नवंबर 2026 को फैसला दिया कि बचाए गए बंधुआ मजदूरों को मुक्ति प्रमाणपत्र जारी होने के आम तौर पर सात दिनों के भीतर तत्काल आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए, और रकम केवल…
- न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह ने मुक्ति और पुनर्वास के बीच के अंतराल पर दो याचिकाओं में देशव्यापी निर्देश दिए। Live Law ने उसी दिन फैसले की खबर दी और The Hindu ने इसे 3…
- बंधुआ मजदूरी की शिकायतों का सत्यापन आम तौर पर 24 घंटों में होना चाहिए, शिकायत सही पाए जाने पर तेजी से बचाव हो। मुक्ति प्रमाणपत्र व्यक्ति को बंधुआ मजदूर पाए जाने के आम तौर पर 24 घंटों के भीतर जारी…
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 2 नवंबर 2026 को फैसला दिया कि बचाए गए बंधुआ मजदूरों को मुक्ति प्रमाणपत्र जारी होने के आम तौर पर सात दिनों के भीतर तत्काल आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए, और रकम केवल इसलिए नहीं रोकी जा सकती कि पुलिस जांच या फौजदारी मामला अभी चल रहा है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह ने मुक्ति और पुनर्वास के बीच के अंतराल पर दो याचिकाओं में देशव्यापी निर्देश दिए। Live Law ने उसी दिन फैसले की खबर दी और The Hindu ने इसे 3 नवंबर की कवरेज में शामिल किया। पीठ ने कहा कि मुक्त मजदूर के प्रति राज्य का कर्तव्य मुक्ति के क्षण पर खत्म नहीं होता।
बंधुआ मजदूरी की शिकायतों का सत्यापन आम तौर पर 24 घंटों में होना चाहिए, शिकायत सही पाए जाने पर तेजी से बचाव हो। मुक्ति प्रमाणपत्र व्यक्ति को बंधुआ मजदूर पाए जाने के आम तौर पर 24 घंटों के भीतर जारी होना चाहिए। सहायता प्रमाणपत्र के सात दिनों के भीतर मिले, और बचाव के 90 दिनों के भीतर व्यक्तिगत पुनर्वास योजना शुरू हो। लंबित फौजदारी मामला भुगतान रोकने की वजह नहीं है, और दो राज्यों के बीच भुगतान को लेकर विवाद भी देरी की वजह नहीं बन सकता।
कोर्ट ने 14 मई 2026 की संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया को देश भर में एक समान लागू करने का आदेश दिया। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश लागू करने के लिए छह महीने मिले हैं। केंद्र सरकार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के परामर्श से तीन महीनों में अतिरिक्त दिशानिर्देश जारी करने हैं।
एक याचिका सुरेंद्र मांझी की थी, जिन्हें 28 फरवरी 2019 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के एक ईंट भट्ठे से अन्य मजदूरों के साथ बचाया गया था। उन्हें तत्काल सहायता 2022 में ही मिली, करीब तीन साल बाद। उस समूह में मुक्ति प्रमाणपत्र पाने वाले 42 मजदूरों में 25 को बीस-बीस हजार रुपये मिले थे और 17 अभी भी इंतजार कर रहे थे। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और बिहार को उन 17 मजदूरों की स्थिति का एक महीने में संयुक्त सत्यापन करने और बकाया रकम हो सके तो तीन महीनों में, हर हाल में छह महीनों के भीतर चुकाने का आदेश दिया।
बंधुआ मजदूरी 1976 में कानून द्वारा खत्म कर दी गई थी, और संविधान का अनुच्छेद 23 बलात श्रम पर रोक लगाता है। कोर्ट ने बचाव के बाद की उस प्रतीक्षा को निशाना बनाया, जब बिना पैसे के मुक्त मजदूर फिर उसी कर्ज में फंस सकता है।
टाइमलाइन
- Feb 28, 2019सुरेंद्र मांझी और अन्य मजदूरों को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के एक ईंट भट्ठे से बचाया जाता है। उनकी तत्काल सहायता 2022 में ही मिलती है।
- May 14, 2026बंधुआ मजदूरी मामलों की संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया की तारीख यही है। सुप्रीम कोर्ट बाद में इसे देश भर में एक समान लागू करने का आदेश देता है।
- Nov 2, 2026सुप्रीम कोर्ट निर्देश देता है कि तत्काल सहायता आम तौर पर मुक्ति प्रमाणपत्र के सात दिनों के भीतर दी जाए, शिकायतों का सत्यापन और प्रमाणपत्र हर चरण में 24 घंटों में हो।
स्रोत
- Live Law: Bonded Labourers Must Get Rehabilitation Assistance Within 7 Days Of Release Certificate, Supreme Court
- JurisHour: Bonded Labourers Must Ordinarily Receive Immediate Aid Within 7 Days, Supreme Court
- Law Chakra: Supreme Court Orders Release Certificates Within 24 Hours in Bonded Labour Timelines Ruling